योग ओलंपिक की पहल भारत से ऋषिकेश बनेगा विश्व स्तरीय आयोजन का केंद्र: डॉ. प्रियंका पटेल

ऋषिकेश: भारत में अंतरराष्ट्रीय योग ओलंपिक के आयोजन को लेकर एक महत्वपूर्ण विचार-विमर्श बैठक का आयोजन ऋषिकेश स्थित एक निजी होटल में किया गया। इस बैठक की अध्यक्षता राजस्थान मानवाधिकार परिषद की प्रदेश अध्यक्ष डॉ. प्रियंका पटेल ने की, जिन्होंने योग को भारत की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत के रूप में विश्व मंच पर प्रतिष्ठित करने का आह्वान किया।

बैठक में राजस्थान के योग ब्रांड एंबेसडर योगाचार्य डॉ. सूरज नोटियाल ने बताया कि योग अब विश्व स्तर पर एक व्यापक और सार्वभौमिक विषय बन चुका है। ऐसे में योग को केवल आसनों की प्रतियोगिता तक सीमित रखना उचित नहीं, बल्कि उसे ओलंपिक जैसे वैश्विक आयोजन के माध्यम से उसकी व्यापकता और गरिमा के अनुरूप प्रस्तुत किया जाना चाहिए।

डॉ. प्रियंका पटेल ने इस पहल को “भारत की सांस्कृतिक कूटनीति” का एक महत्वपूर्ण पड़ाव बताते हुए कहा,

“ऋषियों की इस धरती से योग ओलंपिक की शुरुआत भारत की उस ऐतिहासिक जिम्मेदारी का निर्वहन होगा, जो उसे अपनी परंपरा, दर्शन और नेतृत्व के कारण विश्व में प्राप्त है। यह आयोजन भारत के आध्यात्मिक नेतृत्व को वैश्विक मंच पर पुनः प्रतिष्ठित करने का अवसर है।”

उन्होंने बैठक में प्रस्ताव रखा कि एक राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर की नीति, सलाहकार और क्रियान्वयन समितियाँ बनाई जाएँ, जिनका कार्य न केवल आयोजन की रूपरेखा तय करना हो, बल्कि इसे भारत की संस्कृति, पर्यटन और विदेश नीति के साथ समन्वित करना भी हो।

डॉ. राजे नेगी (पूर्व अध्यक्ष, योग एसोसिएशन) ने जानकारी दी कि आगामी 26 जुलाई को योग नगरी ऋषिकेश में एक भव्य कार्यशाला आयोजित की जाएगी, जिसमें देशभर से करीब डेढ़ दर्जन से अधिक योग साधक भाग लेंगे। इस कार्यशाला में राज्य के खेल मंत्री की उपस्थिति में आयोजन की कार्ययोजना, कार्यकारिणी गठन तथा केंद्र सरकार से समन्वय के विषय पर चर्चा की जाएगी।

कार्यक्रम में उपस्थित सभी योगाचार्यों व अतिथियों — आचार्य विपिन जोशी, डॉ. मनोज रावत, योगाचार्य जयप्रकाश कंसवाल, योगाचार्य पवन बिजल्वाण, योगाचार्य मनोज सिंह, विशाल पटेल, योगाचार्य विनय प्रकाश, योगिनी अम्बिका उनियाल, योगिनी अदिति उनियाल — का पुष्पमालाओं से अभिनंदन एवं स्वागत किया गया।

डॉ. पटेल ने कहा कि, “हमारा उद्देश्य केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि एक नव-सांस्कृतिक आंदोलन खड़ा करना है, जिससे भारत की योग परंपरा न केवल शरीर-मन का विज्ञान बने, बल्कि विश्व शांति और आत्मिक चेतना का सूत्रधार भी बने।”

यह बैठक न केवल योग के वैश्विक पुनरुत्थान की दिशा में एक निर्णायक कदम थी, बल्कि इसमें भारत को योग-राजदूत के रूप में स्थापित करने की सशक्त इच्छा भी झलकी।

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